अदालत राष्ट्रपति, राज्यपाल के लिए तय नहीं कर सकती समय-सीमा

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नई दिल्ली। नीलू सिंह
विधानसभा से पारित विधेयकों को मंजूरी देने के लिए अदालत राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समय-सीमा तय नहीं कर सकती। हालांकि राज्यपाल को सीधे तौर पर अनिश्चित काल तक ‌किसी विधेयक को अपने पास रोककर रखने का कोई अधिकार नहीं है। यह बातें सुप्रीम कोर्ट के पांच जज की संविधान पीठ ने एक अहम फैसले में कहीं। गौरतलब है कि न्यायाधीश बी.आर. गवई की अगुवाई वाली संविधान पीठ ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा संविधान के अनुच्छेद-143 के तहत प्राप्त शक्ति का इस्तेमाल करते हुए पूछे गए संवैधानिक सवालों का जवाब देते हुए फैसला दिया।
संविधान पीठ ने कहा कि अदालत अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल कर विधेयकों को डिम्ड असेंट (स्वत: मंजूर मान लेना) घोषित नहीं कर सकती। संविधान पीठ ने कहा कि विधयेकों को स्वत: मंजूर घोषित करने की अवधारणा न सिर्फ संविधान की भावना के खिलाफ है बल्कि शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत का भी उल्लंघन है। फैसला सुनाते हुए, सीजेआई बी.आर. गवई ने कहा कि विधानसभा से पारित विधेयकों को स्वत: मंजूर घोषित करने की अवधारणा एक संवैधानिक प्राधिकार यानी राज्यपाल के कामकाज पर अतिक्रमण करने के समान है। सीजेआई गवई के अलावा, संविधान पीठ में जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और एएस चंदुरकर भी शामिल हैं। संविधान पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 200/201 के तहत विधेयकों मंजूरी देने को लेकर राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए अदालत कोई समय सीमा निर्धारित नहीं कर सकती। पीठ ने कहा कि हमें यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि समय सीमा खत्म होने पर राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा विधेयक को स्वत: मंजूरी दी गई घोषित करना, वास्तव में न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका के कामों पर कब्जा करना और उन्हें बदलना है। यह हमारे संविधान के दायरे में ठीक नहीं। हालांकि संविधान पीठ ने कहा कि यदि राज्यपाल लंबे समय तक या बिना किसी वजह के मंजूरी देने में देरी करते हैं, जिससे विधायी प्रक्रिया में रुकावट आती है, तो अदालत न्यायिक समीक्षा की अपनी सीमित शक्ति का इस्तेमाल करके राज्यपाल को समय सीमा में सलाह करने का निर्देश जारी कर सकती है। अनुच्छेद 200 विधेयकों को मंजूरी देने की शक्ति से संबंधित है, जबकि 201 विधेयक से जुड़ा है जो राष्ट्रपति के विचार के लिए रखा गया है। संविधान पीठ ने इस ऐतिहासिक फैसले में यह व्यवस्था दी कि राज्यपाल सीधे तौर पर अनुच्छेद 200 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके विधेयकों को अनिश्चित काल तक रोक कर नहीं रख सकते। सर्वसम्मति से पारित 111 पन्नों के फैसले में संविधान पीठ ने कहा कि यदि राज्यपाल को अनुच्छेद 200 (विधेयकों को मंजूरी देने की शक्ति) के तहत विधेयकों को अनिश्चित काल तक रोककर रखने की इजाजत दी जाती है तो यह संघवाद के सिद्धांत के खिलाफ होगा। पीठ ने कहा कि सहमति रोकने की ऐसी सरल शक्ति अनुच्छेद-200 के तहत मौजूद नहीं है और राज्यपाल को निष्क्रियता के माध्यम से कानून को रोकने में सक्षम बनाने वाली कोई भी व्याख्या संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत होगी। संविधान पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 200 के तहत विधानसभा से पारित जब कोई विधेयक राज्यपाल के पास भेजा जाता है तो राज्यपाल को संवैधानिक रूप से केवल तीन विकल्पों की अनुमति है। पहला विधेयक को मंजूरी देना, दूसरा, इसे राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना और तीसरा विधेयक को अपनी टिप्पणियों के साथ विधानसभा को वापस करना।

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