नई दिल्ली। प्रख्यात मूर्तिकार राम सुतार का बुधवार देर रात नोएडा के सेक्टर-19 स्थित आवास पर निधन हो गया। वह 100 वर्ष 10 महीने के थे। मूर्तिकार और पुत्र अनिल राम सुतार ने गुरुवार को बताया कि उनके पिता राम सुतार सितंबर महीने से बीमार चल रहे थे। गुरुवार को सेक्टर-94 स्थित अंतिम निवास में अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान कई कलाकार और बड़ी संख्या में प्रशंसक मौजूद रहे। राम सुतार का जन्म 19 फरवरी, 1925 को महाराष्ट्र के धुले जिले के गोंडूर गांव के एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनका झुकाव मूर्तिकला की ओर था। उन्होंने राष्ट्र के गौरव को जीवंत करने वाले कलाकार के रूप में दुनियाभर में पहचान बनाई। इसमें दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, संसद परिसर में ध्यान में बैठे हुए महात्मा गांधी और घोड़े पर सवार छत्रपति शिवाजी समेत कई प्रतिमाएं प्रमुख रूप से शामिल हैं। सुतार को उनके कार्यों और उपलब्धि के लिए पद्मश्री, पद्म भूषण, टैगोर अवॉर्ड समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। निधन पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे समेत कई नामचीन हस्तियों ने शोक संवेदनाएं व्यक्त कीं। प्रख्यात मूर्तिकार राम वी. सुतार की छवि राष्ट्र की स्मृतियों को आकार देने वाले शिल्पकार के रूप में रही। उन्होंने देश के सार्वजनिक कला परिदृश्य को परिभाषित किया और भारतीय शिल्पकला को वैश्विक मान्यता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रसिद्ध शिल्प सुतार ने बुधवार रात को 100 वर्ष की उम्र में नोएडा में अंतिम सांस ली।
उन्होंने सात दशकों से अधिक के अपने करियर में कलात्मक यथार्थवाद को ऐतिहासिक गहराई के साथ मिलाकर देश की कुछ सबसे प्रतिष्ठित मूर्तियों और स्मारकों का निर्माण किया। दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमाओं में शामिल गुजरात के केवड़िया में नर्मदा नदी किनारे स्थित 182 मीटर ऊंची सरदार पटेल की प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ का डिजाइन उन्होंने ही तैयार किया था, जिसने भारतीय शिल्प को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई। उन्हें ‘स्टेच्यू मैन’ के नाम से भी जाना जाता था और कांसे व पत्थर पर उनकी अद्वितीय महारत के लिए उन्हें भारत और विदेश में अपार सम्मान मिला। विख्यात मूर्तिकार राम सुतार का जन्म 19 फरवरी, 1925 को महाराष्ट्र के धुलिया जिले के गोंडूर गांव में एक गरीब परिवार में हुआ था। अपनी बुनियादी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने बॉम्बे के सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिला लिया। वर्ष 1953 में उन्होंने मॉडलिंग के लिए प्रतिष्ठित मेयो गोल्ड मेडल जीता। वर्ष 1954 से 1958 के बीच सुतार ने औरंगाबाद स्थित पुरातत्व विभाग में कार्य किया। उन्होंने अजंता और एलोरा की गुफाओं में पाई गईं कई प्राचीन मूर्तियों के जीर्णोद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद वह दिल्ली स्थित सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में तकनीकी सहायक के रूप में कार्यरत हो गए।
