राज्य स्वच्छ गंगा मिशन, नमामि गंगे के अंतर्गत महिला महाविद्यालय हल्द्वानी की नमामि गंगे इकाई द्वारा 18 जून 2025 को शहर के हीरानगर स्थित निर्वाण नशा मुक्ति केंद्र में एक दिवसीय योग शिविर का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम योगाचार्य श्रीमती ज्योति चुफाल के निर्देशन में संपन्न हुआ, जिसमें नशा पीड़ितों को शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिए योगाभ्यास, वेदज्ञान और नैतिक दिशा प्रदान की गई।
योगाचार्य श्रीमती ज्योति चुफाल ने प्रतिभागियों को सरल योगासन, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से जीवन को संतुलित व नियंत्रित करने के उपाय बताए। उन्होंने कहा,
“नशा केवल शरीर को ही नहीं, आत्मा को भी दूषित करता है। योग न केवल तन की शुद्धि करता है, बल्कि मन और आत्मा को भी सशक्त बनाता है। योग नशा मुक्ति की दिशा में एक प्रभावशाली साधन है जो व्यक्ति को आत्मसंयम और आत्मविश्वास प्रदान करता है।”
उन्होंने नशा मुक्ति को भारतीय शास्त्रों और वेदों की दृष्टि से समझाते हुए कहा, वेदों में मनुष्य के कल्याण के लिए संयम और पवित्र जीवन पर विशेष बल दिया गया है। ऋग्वेद में कहा गया है ‘मनस्तत्ते अनु विधेम यदृता मनस्तत्ते अनु राधामसि।’ अर्थात हम तुम्हारे उस मन का अनुकरण करें जो सत्य और धर्म के मार्ग पर चलता है। नशा इस चित्तवृत्ति को भ्रष्ट कर देता है।
अथर्ववेद में स्पष्ट रूप से मानसिक संयम का आह्वान करते हुए कहा गया है
‘शं नो देवीरभिष्ठय आपो भवन्तु पीतये।’ अर्थात जल जैसा शुद्ध और शांत बनाने वाला आचरण ही जीवन को उन्नत करता है, न कि नशा जैसे तमोगुणी व्यवहार। उन्होंने कहा कि मनुस्मृति में भी निर्देशित है कि
‘न मद्यं न मांसं न स्तेनं नानृतं न परद्रोहम्।
नैव पानं न शापं च ब्राह्मणः सेवते बुधः॥’ अर्थात ज्ञानी और विवेकी व्यक्ति कभी भी मद्य, चोरी, झूठ और पापकर्म में लिप्त नहीं होता।
नमामि गंगे इकाई के नोडल अधिकारी डॉ. रितुराज पंत ने इस पहल की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा नदियों की स्वच्छता केवल बाह्य सफाई से संभव नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक शुद्धि भी आवश्यक है। जब व्यक्ति स्वयं को भीतर से स्वच्छ करता है, तभी समाज और पर्यावरण की वास्तविक सफाई संभव हो पाती है। योग और वैदिक परंपरा इस दिशा में मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकते हैं। निर्वाण नशा मुक्ति केंद्र की संचालिका श्रीमती रश्मि रावल पंत ने कहा शास्त्रों में आत्मशुद्धि और संयम को ही मोक्ष का आधार बताया गया है। इसलिए आज के समय में नशा केवल सामाजिक ही नहीं, आत्मिक अवनति का कारण भी है। वैदिक मार्ग ही इससे मुक्ति का सच्चा उपाय है। अपने व्यावहारिक जीवन में हम देखते हैं कि नशा न केवल शरीर को विकृत करता है, बल्कि मन और आत्मा को भी दूषित करता है। इस प्रकार के प्रयास हमारे केंद्र में उपचार के साथ-साथ मानसिक और आध्यात्मिक उन्नयन का वातावरण बनाते हैं। योग, ध्यान और भारतीय ज्ञान परंपरा केवल एक चिकित्सा नहीं, बल्कि एक नया जीवन दर्शन है, जो नशे के अंधकार से आत्मप्रकाश की ओर ले जाती है।
कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों को नशा ना करने की शपथ दिलाई गई साथ ही नियमित योग अभ्यास हेतु प्रेरित किया गया तथा नमामि गंगे अभियान के उद्देश्यों व गंगा की निर्मलता हेतु आत्मशुद्धि के महत्व को भी बताया गया। इस अवसर पर गिरीश रेखाडी , नीरज जोशी, आनंद सिंह, दिनेश आगरी, ललित कोश्यारी, यशोधर नाथ आदि उपस्थित रहे।
