लंदन। ओजोन में होने वाले बदलावों से धरती पर गर्मी बढ़ सकती है। एक नए शोध में पता चला है कि बढ़ते वायु प्रदूषण के साथ मिलकर ओजोन का असर पिछले अनुमान से पृथ्वी को 40 फीसदी अधिक गर्म कर सकता है। ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन किया है। इनके मुताबिक, 2015 से 2050 के बीच ओजोन से धरती पर 0.27 वॉट प्रति वर्ग मीटर अतिरिक्त गर्मी बढ़ सकती है। यह ओजोन को कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) के बाद धरती को गर्म करने वाला दूसरा सबसे बड़ा कारण बना देगा। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस दौरान सीओटू से इसी अवधि के दौरान 1.75 वॉट प्रति वर्ग मीटर अतिरिक्त गर्मी बढ़ने का अनुमान है।
बता दें, ऊपरी वातावरण में ओजोन की मौजूदगी सूर्य की हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट किरणों से बचाती है। वहीं ग्रीनहाउस गैस होने के कारण यह गर्मी को भी रोके रखती है। इस बारे में शोधकर्ता बिल कॉलिन्स ने बताया कि सीएफसी और एचसीएफसी जैसे रसायनों पर प्रतिबंध लगाना सही कदम है। क्योंकि यह ओजोन परत को नुकसान पहुंचाते हैं। लेकिन अध्ययन से पता चला है कि जैसे-जैसे ओजोन की परत में सुधार आएगा, उसके साथ ही धरती उम्मीद से कहीं ज्यादा गर्म होगी। अध्ययन में वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडल की भी मदद ली है। इसकी मदद से अनुमान लगाया है कि सदी के मध्य तक वायुमंडल में कैसे बदलाव आंएगे। निष्कर्ष से पता चला कि ओजोन परत की सुरक्षा के लिए सीएफसी और एचसीएफसी गैसों को बढ़ने से रोकने से जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में उतना फायदा नहीं होगा, जितना पहले सोचा गया था। अध्ययन के मुताबिक 1987 में जब देशों ने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत ओजोन परत को बचाने के लिए सीएफसी और एचसीएफसी जैसी गैसों पर प्रतिबंध लगाया, तो उम्मीद थी कि इससे जलवायु परिवर्तन को भी रोका जा सकेगा। लेकिन जैसे-जैसे ओजोन परत में सुधार हो रहा है, यह धरती को और गर्म कर रही है और इन गैसों पर रोक से मिलने वाला जलवायु लाभ काफी हद तक कम हो रहा है। यह पृथ्वी के वायुमंडल का एक पतला आवरण है, जो समताप मंडल (लगभग 15 से 30 किमी ऊपर) में पाई जाती है और सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी विकिरण को अवशोषित करके जीवन की रक्षा करती है। इस परत की वजह से त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद और आनुवंशिक क्षति जैसी बीमारियां नहीं होती।
