देश भर की सड़कों से लावारिस कुत्तों को हटाया जाए : शीर्ष कोर्ट

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि देश में लोग न सिर्फ कुत्तों के काटने से मर रहे हैं, बल्कि सड़कों पर लावारिस पशुओं के चलते होने वाले हादसों की वजह से भी मर रहे हैं। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए देशभर में सड़कों से लावारिस कुत्तों और पशुओं को हटाने का आदेश दिया है।
जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन. वी. अंजारिया की विशेष पीठ ने कहा कि यह सिर्फ कुत्तों के काटने की बात नहीं है, बल्कि सड़कों पर लावारिस पशुओं का घूमना भी खतरनाक है और हादसों के कारण बन रहे हैं। जस्टिस मेहता ने कहा कि पिछले 20 दिनों में लावारिस पशुओं के चलते राजस्थान हाईकोर्ट के दो जज सड़क हादसे के शिकार हुए हैं और एक जज अभी भी रीढ़ की हड्डी की चोट से पीड़ित हैं। उन्होंने कहा कि यह एक बेहद ही गंभीर मुद्दा है। लावारिस कुत्तों की समस्या से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने यह निर्देश दिया। मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने मुख्य रूप से संस्थागत परिसरों में लावारिस कुत्तों के मुद्दे पर बात की और सवाल उठाया कि क्या अदालत, स्कूल, कॉलेज और अस्पतालों जैसी जगहों पर कुत्तों की मौजूदगी होनी चाहिए? पीठ ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि संस्थानों की जगहें सड़कों से अलग होती हैं। जस्टिस मेहता ने कहा कि ‘जहां तक ​​संस्थानों की बात है, वे सड़कें नहीं हैं। उन्होंने आगे कहा कि संस्थान ऐसी जगहें हैं जहां बच्चों, मरीजों, दिव्यांगों और आम लोगों को बिना किसी रुकावट के आने-जाने की सुविधा मिलनी चाहिए। जस्टिस विक्रम नाथ ने इस समस्या में शामिल अनिश्चितता पर जोर दिया और कहा कि ‘यह सिर्फ कुत्ता के काटने का मामला नहीं बल्कि यह कुत्तों से होने वाला खतरा भी है। हादसे का खतरा, आप कैसे पहचानेंगे? सुबह कौन सा कुत्ता किस मूड में है, आपको नहीं पता।’ जब कुछ अधिवक्ताओं ने कहा कि कुत्तों के हमले हो रहे हैं, तो इस पर शीर्ष अदालत ने कहा कि वह इस बात को समझते हैं कि बच्चों और बड़ों को कुत्ते काट रहे हैं और उनकी जान जा रही है। मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि ‘रोकथाम हमेशा इलाज से बेहतर है। उन्होंने कहा कि इस मामले में बहस करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है क्योंकि अदालत ने केवल संस्थागत क्षेत्रों से लावारिस कुत्तों को हटाने का निर्देश दिया है और किसी भी नियम और विनियमों में हस्तक्षेप नहीं किया है। उन्होंने कहा कि इस मामले में वह राज्यों और नगर निकायों द्वारा नियमों, विनियमों, मॉड्यूल और मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) को सख्ती से लागू करने की कोशिश कर रही है। इससे पहले, शीर्ष अदालत के 7 नवंबर के आदेश में संशोधन की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पीठ से कहा कि इस समस्या का समाधान सभी कुत्तों को पकड़ना नहीं है, बल्कि एक वैज्ञानिक फॉर्मूला अपनाना है, जिसे दुनिया भर में पशु-मानव संघर्ष को कम करने के लिए स्वीकार किया गया है। उन्होंने कहा कि अदालत लावारिस कुत्तों की आबादी को प्रबंधन और नियंत्रण करने के लिए सीएसवीआर (कैप्चर, स्टेरिलाइज, वैक्सीनेट और रिलीज) का फॉर्मूला अपना सकता है, जिससे धीरे-धीरे कुत्तों के काटने की घटनाएं कम होंगी।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कुछ राज्यों ने हमारे आदेशों के पालन और तर्कों के कार्यान्वयन पर जवाब नहीं दिया है। पीठ ने कहा कि जवाब दाखिल नहीं करने वाले राज्यों के साथ हम बहुत सख्ती से पेश आएंगे। सभी राज्यों को नियमों, विनियमों और एसओपी का प्रभावी तरीके से पालन करना होगा।

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